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तीसरा किस्स (Nice sex story) Part-8 [last]

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​तीसरा किस्स :-

मोना ने हिचकिचाते हुए पहले तो उसने अपनी नाज़ुक अंगुलियों से उसे प्यार से छुआ और फिर अन्डरवीयर नीचे खिसकाते हुए मेरे लण्ड को पूरा अपने हाथों में भर लिया और सहलाने लगी. मेरे लण्ड ने एक ठुमका लगते हुए उसे सलामी दी और पत्थर की तरह कठोर हो गया. अब मोना लगभग औंधी लेटे मेरे लण्ड के साथ खेल रही थी और मेरे सामने थे उसके गोल मटोल नितम्ब. मैने उन पर प्यार से हाथ फिराना शुरू कर दिया. वाह क्या घाटियाँ थी.

इस कहानी के अन्य भाग

तीसरा किस्स (Nice sex story) Part-1

तीसरा किस्स (Nice sex story) Part-2

तीसरा किस्स (Nice sex story) Part-3

तीसरा किस्स (Nice sex story) Part-4

तीसरा किस्स (Nice sex story) Part-5

तीसरा किस्स (Nice sex story) Part-6

तीसरा किस्स (Nice sex story) Part-7

तीसरा किस्स (Nice sex story) Part-8 [last]

गुलाबी रंग की कसी हुई दो गोलाकार पहाड़ियां और उनके बीच एक बहती नदी की मानिंद गहरी होती खाई. मैं तो किसी अनजाने जादू से बंधा बस उसे देखता ही रह गया. फिर धीरे से मैने पैंटी के ऊपर से ही उन गोलाइयों पर हाथ फेरना शुरू कर दिया.
मैने एक हाथ से उसका चेहरा अपने लण्ड के सुपाड़े पर छुआते हुए कहा- इसे प्यार कर ना ! चूम लो मेरे लौड़े को अपने होठों से !

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रहस्यमयी मुस्कान अपने होठों पर लाते हुए मोना ने मुझे घूरा और फिर तड़ से एक किस्स ले लिया. मोना के होंठ थोड़े खुले थे, मैने एक हल्का सा झटका ऊपर को लगाया तो पूरा सुपाड़ा मोना के मुँह में चला गया. वो इसे बाहर निकालना ही चाहती थी कि मैने उसके सिर को नीचे दबा दिया जिससे मेरा पूरा लण्ड उसके गले तक चला गया और वो गों-गों करने लगी. तब मैने उसके सिर को छोड़ा, उसने लण्ड को मुँह से निकाला और बनावटी गुस्से से बोली- क्या करते हो जिज्जू? मेरा तो सांस ही रुक गया था,!
चूसो ना जैसे अंगूठा चूसती हो ! बहुत मज़ा आएगा तुम्हें और मुझे भी !
यह तो अंगूठे से दुगना मोटा है ! कहते हुए उसने मेरी आंखों में देखा और मेरा आधा लौड़ा अपने मुंह में ले लिया और चूसने की कोशिश करने लगी. फ़िर लण्ड को मुंह से निकाल कर बोली- कैसे चूसूँ? चूसा ही नहीं जा रहा !

मैने उसे लण्ड को मुंह में लेने को कहा और फ़िर उसका सिर पकड़ कर उसके मुंह में दो-चार धक्के लगाते हुए कहा- ऐसे चूसो !
अब तो वो लण्ड चूसने में मस्त हो गई और मैं अपनी उंगलियाँ उसकी पैन्टी में ले गया उसके अनावृत कूल्हों का जायजा लेने !
इससे बेखबर मेरा लण्ड चूसे जा रही थी किसी आइस-कैंडी की तरह जैसे मैने उसे परसों मज़ाक में कुल्फी चूसने को कहा था.

ये लड़की तो लण्ड चूसने में अपनी माँ (शितल) को भी पीछे छोड़ देगी. आह उसकी नरम मुलायम थूक से गीली जीभ का गुनगुना अहसास अच्छे अच्छों का पानी निचोड़ ले. कोई पाँच-छः मिनट उसने मेरा लण्ड चूसा होगा. फिर वो अपने होंठो पर जीभ फेरती हुई उठ खड़ी हुई. उसकी रसीली आँखों में एक नई चमक सी थी. जैसे मुझे पूछ रही हो कैसा लगा ?
मैं थोड़ी देर ऐसे ही बारी बारी उसके सभी अंगों को चूमता रहा लेकिन उसकी बुर को हाथ नहीं लगाया. मैं जानता था,कि मोना की बुर ने अब तक बेतहाशा काम-रस छोड़ दिया होगा पर मैं तो उसे पूरी तरह तैयार और उत्तेजित करके ही आगे बढ़ना चाहता था,ताकि उसे अपनी बुर में मेरा लण्ड लेते समय कम से कम परेशानी हो. मेरा लण्ड प्री-कम के टुपके छोड़ छोड़ कर पागल हुआ जा रहा था. ऐसा लग रहा था,कि अगर अब थोड़ी देर की तो यह बगावत पर उतर आएगा या खुदकुशी कर लेने पर मजबूर हो जायेगा. आप मेरी हालत समझ रहे है ना.

मोना की आँखें अब भी बंद थी. मैने धीरे से उससे कहा,’आँखें खोलो मेरी प्रियतमा’
तो वो उनींदी आँखों से बोली,’बस कुछ मत कहो ऐसे ही मुझे प्यार किये जाओ मेरे प्रियतम !’
प्यारे पाठको और पाठिकाओं ! अब पैंटी की दीवार हटाने का समय आ गया था. मैने मोना से जब पैंटी उतारने को कहा तो उसने कहा,’ पहले आप अपना अंडरवियर तो उतारो !’
मेरा अंडरवियर तो पहले ही घायल हो चुका था,याने फट चुका था,बस नाम मात्र का अटका हुआ था. मैने एक झटके में उसे निकाल फेंका और फिर मोना की पैंटी को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर धीरे धीरे नीचे करना शुरू किया- अब तो क़यामत सिर्फ एक या दो इंच ही दूर थी !!
जिसके लिए विश्वामित्र और नारद जैसे महा-ऋषियों का मन डोल गया वो पल अब मेरे सामने आने वाला था. पहले सुनहरे रोएँ नज़र आये और फिर दो भागो में बटा बुर का पहला नज़ारा- रक्तिम चीरा बाहरी होंठ मोटे और सुर्ख लाल गुलाबी रंगत लिए छोटे होंठ कुछ श्यामलता लिए दोनों आपस में प्रगाढ़ सहेलियों की तरह चिपके हुए और उसके नीचे सुनहरी रंग का गोल गोल गांड का छेद. आह,,,  मैं तो बस इस दिलकश नजारे को देख कर अपनी सुध बुध ही खो बैठा.

पैंटी निकाल कर दूर फेंक दी. उसकी संगमरमरी जांघे केले के तने की तरह चिकनी और सुडोल जाँघों को मैने कांपते हाथों से उन्हें सहलाया तो मोना की एक सित्कार निकल गई और उसके पैर अपने आप चौड़े होते चले गए. फिर मैने हौले से उसके सुनहरी बालो पर हाथ लगाया.
उफ़,,,  मक्का के भुट्टे को अगर छील कर उस पर उगे सुनहरी बालो का स्पर्श करें तो आपको मोना की बुर पर उगे उन छोटे छोटे रेशम से मुलायम बालों (रोएँ) का अहसास हो जायेगा. बाल ज्यादा नहीं थे सिर्फ थोड़े से उपरी भाग पर और दोनों होंठो के बाहर केवल आधी दूर तक जहां चीरा ख़त्म होता है उससे कोई दो इंच ऊपर तक. बुर जहां ख़त्म होती है उसके ठीक एक इंच नीचे जन्नत का दूसरा दरवाजा. उफ़ एक चवन्नी के आकार का बादामी रंग का गोल घेरा जैसे हंसिका मोटवानी या प्रियंका चोपड़ा ने सीटी बजाने के अंदाज में अपने होंठ सिकोड़ लिए हों.
मैने अपनी दोनों हाथों से उसकी पंखुड़ियों को थोड़ा सा चोड़ा किया. एक हलकी सी ‘पुट’ की आवाज के साथ उसकी बुर थोड़ी सी खुल गई केवल दो इंच रतनार सुर्ख लाल अनार के दाने जितनी बड़ी मदन मणि और बीच में मूत्र छेद माचिस की तिल्ली जितना बड़ा और उसके एक इंच नीचे स्वर्ग गुफा का छोटा सा छेद कम रस से भरा जैसे शहद की कुप्पी हो.

मैं अब कैसे रुक सकता था. मैने बरसों के प्यासे अपने जलते होंठ उन पर रख ही दिए. एक मादक सुगंध से मेरा सारा तन मन भर उठा. मोना तो बस मेरा सिर पकड़े अपनी आँखें बंद किये पता नहीं कहाँ खोई हुई थी उसका पूरा शरीर काँप रहा था. और मुंह से बस हौले-हौले सीत्कार ही निक़ल रही थी.
मैने अपनी जीभ की नोक जैसी ही उसकी मदनमणि पर लगाई, मोना का शरीर थोड़ा सा अकड़ा और उसकी बुर ने शहद की दो तीन बूँदे मुझे अर्पित कर दी. ओह मेरे प्यार का पहला स्पर्श पाते ही उसका छोटा स्खलन हो गया. उसके हाथ और पैर दोनों अकड़े हुए थे शरीर काँप रहा था. मेरा एक हाथ उसके उरोजों को मसल रहा था,और दूसरा हाथ उसके गोल गोल नितम्बों को सहला रहा था.
मैने उसकी बुर को चूसना शुरू कर दिया. मोना तो सातवें आसमान पर थी. लगभग दस मिनट तक मैने उसकी बुर चूसी होगी. फिर मैने उसकी बुर चूसते चूसते पास पड़ी डब्बी से थोड़ी सी वैसलीन अपने दायें हाथ की तर्जनी अंगुली पर लगाई और होले से उसकी बुर की सहेली पर फिरा दी. मोना ने रोमांच से एक बार और झटका खाया. अब मैने दो चीजें एक साथ की उसकी शहद की कुप्पी को जोर से चूसने के बाद उसके अनार दाने को दांतों से होले से दबाया और अपने दायें हाथ की वैसलीन से भरी अंगुली का पोर उसके प्रेम द्वार की प्यारी पड़ोसिन के सुनहरी छेद में डाल दिया.

‘ऊईईई,,,  मम्म्मीईइ,,, जीजू….,,, ऊ आह्ह्ह मुझे कुछ हो रहा है मैं मर गई,,,  आह्ह्ह,,,  ऊओईईईइ,,, इ ह्हीईइ,,,  य्याआया,,,  !!’
मोना का शरीर अकड़ गया, उसने मेरे सिर के बालों को नोच लिया, और अपनी जाँघों को जोर से भींच लिया और जोर की किलकारी के साथ वो ढीली पड़ती चली गई और उसके साथ ही उसकी बुर ने कोई तीन-चार चम्मच शहद (कामरस) उंडेल दिया जिसे मैं भला कैसे व्यर्थ जाने देता, गटागट पी गया. ये उसके जीवन का पहला ओर्ग्जाम था.
कुछ पलों के बाद जब मोना कुछ सामान्य हुई तो मैने होले से उसे पुकारा,’मेरी माधवी ! मेरे प्रेम की देवी ! कैसा लग रहा है ?’
‘उन्ह !! कुछ मत पूछो मेरे प्रेम देव ! आज की रात बस मुझे अपनी बाहों में लेकर बस प्यार बस प्यार ही करते रहो मेरे प्रथम पुरुष !’
मैने एक बार फिर उसे अपनी बाहों में भर लिया. अब बस उन पलों की प्रतीक्षा थी जिसे मधुर मिलन कहते है. मैं अच्छी तरह जानता था,भले ही मोना अब अपना सर्वस्व लुटाने को तैयार है पर है तो अभी कमसिन कच्ची मासूम कली ही ? वो भले ही इस समय सपनो के रहस्यमई संसार में गोते लगा रही है पर मधुर मिलन के उस प्रथम कठिन चरण से अभी अपरिचित है. मैं मोना से प्यार करता था,और भला उसे कोई कष्ट हो मैं कैसे सहन कर सकता था.
शायद आप रहे कि मैने अपना इरादा बदल लिया होगा और उसे चोदने का विचार छोड़ दिया होगा तो आप गलत सोच रहे है. मैं तो कब से उसे चोदना चाहता था. पर उसकी उम्र और किसी गड़बड़ की आशंका से डर रहा था. हाँ उसकी बातें सुनकर एक बदलाव जरूर आ गया. मुझे लगा कि मैं सचमुच उसे प्यार करने लगा हूँ. जैसे वो मेरी कोई सदियों की बिछुड़ी प्रेमिका है जिसे मैं जन्मि-जन्मानंतर तक प्यार करता रहूँगा.
फिर सब कुछ सोच विचार करने के बाद मैने एक जोर की सांस छोड़ते हुए उसे समझाना शुरू किया,’देखो मेरी प्रियतमा ! अब हमारे मधुर मिलन का अंतिम पड़ाव आने वाला है. ये वो परम आनंद है जिसके रस में ये सारी कायनात डूबी है !’
‘मैं जानती हूँ मेरे कामदेव !’
‘तुम अभी नासमझ हो ! प्रथम मिलन में तुम्हें बहुत कष्ट हो सकता है !’
‘तुम चिंता मत करो मेरे प्रियतम ! मैं सब सह लूंगी मैं सब जानती हूँ !’
अब मेरे चौंकने की बारी थी मैने पुछा ‘तुम ये सब ??’
‘मैने माँ और पापा को कई बार रति-क्रीड़ा और सम्भोग करते देखा है और अपनी सहेलियों से भी बहुत कुछ सुना है.’
‘अरे कऽ क.. क्या बात करती हो,,,  तुमने ?’ मेरे आश्चर्य कि सीमा नहीं रही ‘क्या देखा है तुमने और क्या जानती हो तुम ?’
‘वोही जो एक पुरुष एक स्त्री के साथ करता एक प्रेमी अपनी प्रेमिका के साथ करता एक भंवरा किसी कली के साथ करता है, सदियों से चले आ रहे इस जीवन चक्र में नया क्या है जो आप मेरे मुंह से सुनना चाहते हैं ,,,  मैं,,,  मैं,,,  रसकूप, प्रेम द्वार, काम-दंड, रति-क्रीड़ा और मधुर मिलन जैसे शब्दों का नाम लेकर तुम्हें कैसे बताऊँ,,,  मुझे क्षमा कर दो मेरे प्रियतम ! मुझे लाज आती है !’
मैं हक्का बक्का सा उसे देखता ही रह गया. आज तो ये मासूम सी दिखनेवाली लड़की न होकर अचानक एक प्रेम रस में डूबी नवयौवना और कामातुर प्रेयसी नज़र आ रही है.
बस अब बाकी क्या बचा था,??? मैने एक बार फिर उसे अपनी बाहों में भर लिया,,, और,,, .
हमारे इस मधुर (प्रेम) मिलन (इसे चुदाई का नाम देकर लज्जित न करें) के बारे में मैं विस्तार से नहीं लिख पाऊंगा. सदियों से चले आ रहे इस नैसर्गिक सुख का वर्णन जितना भी किया जाए कम है. रोमांटिक भाषा में तो पूरे ग्रन्थ भरे पड़े हैं. वात्स्यायन का कामसूत्र या फिर देशी भाषा में मस्तराम की कोई किताब पढ़ लें.

मैने मोना से उसके रजोदर्शन (मासिक) के बारे में पूछा था,(मैं उसे गलती से भी गर्भवती नहीं करना चाहता था) तो उसने बताया था,कि उसकी अगली तारीख एक जून के आस पास है और आज तो 28 मई है ! और फिर ! दिल्ली लुट गई,,, ,,, ,,, ,,, ,,, ,,, ,,, ,,, !!
हमें कोई दस-पन्द्रह मिनट लगे होंगे. ऐसा नहीं है कि सब कुछ किसी कुशल खिलाड़ियों के खेल की भाँति हो गया हो. मोना जिसे खेल समझ रही थी वास्तव में थोड़ा सा कष्ट कारक भी था. वो थोड़ा रोई-चिल्लाई भी ! पर प्रथम-मिलन के उन पलों में उसने पूरा साथ दिया. आज वो कली से फूल बनकर तृप्त हो गई थी. हम दोनों साथ साथ स्खलित हुए. उसे थोड़ा खून भी निकला था. मैने अपने कुरते की जेब से वोही रेशमी रुमाल निकाला जो मोना ने मुझे बाज़ार में गिफ्ट दिया था,और उसके प्रेम द्वार से चुते मेरे प्रेम-रस, मोना के काम-राज और रक्त का मिलाजुला मिश्रण उस अनमोल भेंट में डुबो कर साफ़ कर दिया और उसे अमूल्य निधि की तरह संभाल कर अपने पास रख लिया.

फिर हम दोनों ने बाथरूम में जाकर सफाई की. मोना की मुनिया पाव रोटी की तरह सूज गई थी, उसके निचले होंठ बहुत मोटे हो गए थे जैसे ऊपर वाले होंठों का डबल रोल हो. मैने उसकी पिक्की ? बुर ? चुत ? (अरे नहीं यार मैं तो उसे मुनिया कहूँगा) पर एक किस्स ले लिया और मोना ने भी मेरे सोये पप्पू को निराश नहीं किया उसने भी एक किस्स उस पर ले लिया.
मैने खिड़की का पर्दा हटा दिया. चाँद की दूधिया रोशनी से कमरा जगमगा उठा. दूर आसमान में एकम का चाँद अपनी चांदनी बरसाता हुआ हमारे इस मधुर मिलन का साक्षी बना मुस्कुरा रहा था. मोना मेरी गोद में सिर रखे अपनी पलकें बंद किये सो रही थी.
मैने उदास स्वर में कहा ‘मोना मेरी जान, मेरे प्राण, मेरी आत्मा, मेरी प्रेयसी कैसी हो ?’
उस से बिछुड़ने की वेदना मेरे चहरे पर साफ़ झलक रही थी. कल मोना वापस चली जायेगी.
‘अब मैं कली से फूल, किशोरी से युवती, मोना और मोना से माधवी बन गई हूँ और मेरी पिक्की अब भोस नहीं,,,  प्रेम रस भरा स्वर्ग द्वार बन गई है कहने को और क्या शेष रह गया है मेरे प्रेम दीवाने, मेरे प्रेम देव, मेरे प्रथम पुरुष !’ मोना ने रस घोलती आवाज में कहा.
आप जरूर सोच रहे होंगे अजीब बात है ये बित्ते भर की +2 में पढ़ने वाली नादान अंगूठा चूसने वाली नासमझ सी लोंडिया इतनी रोमांटिक और साहित्यिक भाषा में कैसे बात कर रही है ? मैने (लेखक ने) जरूर कहीं से ये संवाद व्ही शांता राम की किसी पौराणिक फिल्म या किसी रोमांटिक उपन्यास से उठाया होगा ?

आप सरासर गलत हैं. मैने भी मोना (सॉरी अब माधवी) से उस समय पूछा था,तो उसने जो जवाब दिया था,आप भी सुन लीजिये :-
‘क्यों मेरे पागल प्रेम दीवाने जब आप अपने आप को बहुत बड़ा ‘प्रेम गुरु’ समझते हैं, अपने कंप्यूटर पर ‘जंगली छिपकलियों’ के फोल्डर और फाइल्स को लोक और अन्लोक कर सकते है तो क्या मैं आपकी उस काले जिल्द वाली डायरी, जिसे आपने परसों स्टडी रूम में भूल से या जानबूझ कर छोड़ दिया था, नहीं पढ़ सकती ? ‘
हे भगवान् ? मैं हक्का बक्का आँखें फाड़े उसे देखता ही रह गया. मुझे ऐसा लगा जैसे हजारों वाट की बिजलियाँ एक साथ टूट पड़ी हैं. मैने कथा,के शुरू में आपको बताया था,कि मैं उन दिनों डायरी लिखता था,और ये वोही डायरी थी जिसके शुरू में मैने अपनी सुहागरात और मधुर मिलन के अन्तरंग क्षणों को बड़े प्यार से संजोया था,और उसके प्रथम पृष्ठ पर ‘मधुर प्रेम मिलन’ लिखा था. मैने इसे बहुत ही संभाल कर रखा था,और मधु को तो अब तक इसकी हवा भी नहीं लगने दी थी, न जाने कैसे उस दिन आजकल के अनुभवों के नोट्स लिखते हुए स्टडी रूम में रह गई थी.
ओह ! अब तो सब कुछ शीशे की तरह साफ़ था.
‘आपको तो मेरा धन्यवाद करना चाहिए कि वो डायरी मैने बुआजी के हाथ नहीं पड़ने दी और अपने पास रख ली नहीं तो इतना बड़ा हंगामा खड़ा होता कि आपका सारा का सारा साहित्यिक ज्ञान और प्रेम-गुरुता धरी की धरी रह जाती ?’ मोना ने जैसे मेरे ताबूत में एक कील और ठोक दी.

‘ओह थैंक यू ,,,  मोना ओह बा माधवी कहाँ है वो ड़ायरी ?? लाओ प्लीज मुझे वापस दे दो !’
‘ना ! कभी नहीं वो तो मैं जन्म-जन्मान्तर तक भी किसी को नहीं दूँगी, मेरे पास भी तो हमारे प्रथम मधुर मिलन के इन अनमोल क्षणों की कुछ निशानी रहनी चाहिए ना ?’
मैं क्या बोलता ?
मोना फिर बोली ‘मधुर मिलन की इस रात्रि में उदासी का क्या काम है ! आओ ! सपनों के इस संसार में इन पलों को ऐसे व्यर्थ न गंवाओ मेरे प्रियतम ! ये पल फिर मुड़ कर नहीं आयेंगे !’
और मोना ने एक बार फिर मेरे गले में अपनी नाज़ुक बाहें डाल दी. इस से पहले कि मैं कुछ बोलता मोना के जलते होंठ मेरे होंठों पर टिक गए और मैने भी कस कर उन्हें चूमना शुरू कर दिया.
बाहर मोना के मामाजी (अरे यार चन्दा मामा) खिड़की और रोशनदान से झांकते हुए मुस्कुरा रहे थे.
अगली सुबह,,

मोना के पास तो लंगड़ाकर चलने का बहाना था,(टांगो के बीच में दर्द का नहीं एड़ी में दर्द का) पर मेरे पास तो सिवाए सिर दर्द के और क्या बहाना हो सकता था. मैने इसी बहाने ऑफिस से बंक मार लिया. आज मेरी मोना मुझ से बिछुड़ कर वापस जा रही थी. शाम की ट्रेन थी. मेरा मन किसी चीज में नहीं लग रहा था. एक बार तो जी में आया कि मैं रो ही पडूं ताकि मन कुछ हल्का हो जाए पर मैने अपने आप को रोके रखा. दिन भर अनमना सा रहा. मैं ही जानता हूँ मैने वो पूरा दिन कैसे बिताया.
ट्रेन कोई शाम को सात बजे की थी. सीट आराम से मिल गई थी. जब गाड़ी ने सीटी बजाई तो मैं उठकर चलने लगा. मोना के प्यार में भीगी मेरी आत्मा, मेरा हृदय, मेरा मन तो वहीं रह गया था.
मैं अभी डिब्बे से नीचे उतरने वाला ही था,कि पीछे से मोना की आवाज आई,’फूफाजी,,, ! आप अपना मोबाइल तो सीट पर ही भूल आये !’
मोना भागती हुई आई और मुझ से लिपट गई. उसने अपने भीगे होंठ मेरे होंठों पर रख दिए और किसी की परवाह किये बिना एक मेरे होंठों पर ले लिया. मैने अपने आंसुओं को बड़ी मुश्किल से रोक पाया.
मोना ने थरथरती हुई आवाज में कहा,’मेरे प्रथम पुरुष ! मेरे कामदेव ! मेरी याद में रोना नहीं. अच्छे बच्चे रोते नहीं ! मैं फिर आउंगी, मेरी प्रतीक्षा करना !’
मोना बिना मेरी और देखे वापस अपनी सीट की और चली गई. मेरी अंगुलियाँ मेरे होंठों पर आ गई. मैं मोना के इस तीसरे किस्स का स्पर्श अभी भी अपने होंठो पर महसूस कर रहा था.

मैं डिब्बे से नीचे उतर आया. गाड़ी चल पड़ी थी. खिड़की से मोना का एक हाथ हिलाता हुआ नज़र आ रहा था. मुझे लगा कि उसका हाथ कुछ धुंधला सा होता जा रहा है. शायद मेरी छलछलाती आँखों के कारण. इस से पहले कि वो कतरे नीचे गिरते मैने अपनी जेब से वोही रेशमी रुमाल निकाला जो मोना ने मुझे गिफ्ट किया था,और हमारे मधुर मिलन के प्रेम रस से भीगा था, मैने अपने आंसू पोंछ लिए.
मेरे आंसू और मोना के होंठो का रस, हमारे मधुर मिलन के प्रेम रस से सराबोर उस रस में मिल कर एक हो गए. मैं बोझिल कदमों और भारी मन से प्लेटफार्म से बाहर आ गया. मेरा सब कुछ तो मोना के साथ ही चला गया था.
दोस्तों सच बताना आपको कहानी कैसी लगी?

आपके कमेंट्स का इन्तेजार रहेगा.

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